"करू वंदना ,करू नमन ।
"माँ "
क्या ?पुजती रहती हो ?
गंगा से भी पवित्र हो तुम ।
क्या ?मन ही मन गुनती हो ।
हो सप्ततीर्थो से भीं तीर्थ तुम ,
निश्चल प्रेम बन ह्रदय में बहती हो ।
हो अतुलनीय तुम ,तुलना किससे ?
सूर्य -चन्द्रमा सी दमकती हो ।
हाथ जोड़ कर खड़े खुद दिवाकर ।
किसकी प्रार्थना करती हो "
है विशाल आँचल में पुण्य छिपा ।
"माँ "
तुम संसार बन जग में खिलती हो ।

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