कुछ कहने से पहले, सुनना ।
इन आँखों का भी कुछ कहना ।
जर्जर थी मै बर्बरता से पहले ।
मुझको भी दे दो एक गहना ।
नीर नहीं नदियों में जितना ।
आँखों में समंदर सा सब सहना ।
कब तक गूंजेगे चीखो के गूंज ?
कोंख में दर्द है मेरे ललना ।
लहू -लुहान न कर ह्रदय मेरे ।
प्रेम से अब हम सब को रहना ।
बंद कर दो मंजर ये खंजर का ।
निर्भीक हो कर आज है कहना ।
ये वन "उपवन "था स्वर्ग सा ।
हाट पर बैठती थी हम सब बहना ।
आज डर लगता है मुझको खुद से ।
मै "माँ " हु तू ही तो है मेरा गहना।

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