गुरुवार, 19 मार्च 2009

"मुट्ठी भर आसमान "


" एक मुट्ठी भर आसमान लिए बैठा हूँ |

अनंत तक ह्रदय में प्यार लिए बैठा हूँ |

कैसे मुक्त कर कर दू ?

सीमओं के उस पार हुए बैठा हूँ|

घिर गया बदलो से कुछ इस तरह ,

ख़ुद से ही बेजार हुए बैठा हूँ |

क्या शक्ल दे गया ?वो जाते जाते

ह्रदय से ही आर -पार हुए बैठा हूँ |"

3 टिप्‍पणियां:

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

ह्रदय में प्यार लिए बैठा हूँ -

पंक्तियाँ अच्छी हैं,

पर फोटो ज़्यादा अच्छा लगा!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

"एक मुट्ठी भर आसमान लिए बैठा हूँ ,
अनंत तक ह्रदय में प्यार लिए बैठा हूँ "

बहुत सुन्दर कविता है।
बधाई!

Unknown ने कहा…

आपकी कवितायेँ बहुत आच्छी लगीं ! लेखनी चलते रहे !बधाई !