शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

"धुंध "



"धुंध से घिर जा तू आज भी आसमान|


हूँ "नदी "मै आज भी उन्मुक्त , पास आ|


है "विशाल "पहाडियों "से भी मेरा ह्रदय|


समाहित इनमे भी है..... ,मेरा ही "नेह"|


तेरा तुझमे क्या था ?ये तू बता ?


ये बादल भी सदियों से मेरे ही थे|


ये कोहरों को क्या है पता ?


ऐ "तप "मेरे मुझको ही गले लगा


सुषमा (प्रकृति )करती है दूरियोंको ,


कुछ इस तरह ही बयां


है ,सब कुछ अलग -अलग यहाँ


यही दुनिया है ,धुंध में  कर लो ख़ुद को समां "

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